शीर्षक रहित रचना
क्षणिकापढ लेते हैं ‘कलमा’ सभी कौन पढता और समझता है हाशिए भी कहते हैं कुछ कहानी । सीमा…
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पढ लेते हैं ‘कलमा’ सभी कौन पढता और समझता है हाशिए भी कहते हैं कुछ कहानी । सीमा…
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‘समय की धारा’ गम के साये में समझ पाये, कौन अपने हैं कौन है पराये। पिघली बर्फ,नदी हो…
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‘जिन्दगी’ तराजू के एक पलडें में वक्त और जरूरत के बदले जाने पर, मनुष्य का बदल जाना, जीवन…
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प्यार का अर्थ पाना नहीं, देना प्यार पाने की इच्छा, किसी के करीब होने की चाह, किसी का…
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इंसान थे हम, देवता बना वो पूजते रहे बेखबर इस बात से पत्थरों की भी उम्र होती है…
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सुख के पंख होते हैं उडा जा सकता है अंतहीन असीमित इसी भ्रम में दुख की परत दर…
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वो कहती हुई चली गई इस दुनिया से कि शब्दबद्ध किया करू मैं अपने उदगारों को प्रतिदिन मैं…
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बेइंतहा प्यार मिला जिन्दगी को उस रंगीन कैन्वस की तरह जो रंगहीन हुआ करता है वक्त के बेरहम…
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