फ़ासले
कविताकुछ यथार्थ तुम्हारे हैं कुछ यथार्थ मेरे फिर कुछ हैं ---- हमारे यथार्थ में । तुम चलते रेगिस्तान…
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कुछ यथार्थ तुम्हारे हैं कुछ यथार्थ मेरे फिर कुछ हैं ---- हमारे यथार्थ में । तुम चलते रेगिस्तान…
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हर क्षण होठों पर सिमटी मुस्कराहट के पीछे क्या आपने देखी है- बनावट की मोटी परत क्या महसूस…
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ऐसा भी होता है निशा, क्या बात है, आरती अपना स्कूटर रोक कर क्या कह रही थी ?…
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जब कभी हिजडों को रेड लाइटो पर भीख मांगते देखती हूँ तो मन द्रवित सा हो जाता है।…
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गरिमा, आज तुम फिर लेट हो गई, क्या हुआ? क्या बताऊ यार हम वर्किगं लेडीज की बहुत-सी समस्याएँ…
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‘एक’ रचना : प्रिया अब तो तुम्हारे मम्मी पापा ने भी तुम्हारे और रमन के प्यार को स्वीकृति…
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महानगरों में प्रत्येक हाऊसिंग सोसाइटी के आस पास या कुछ दूरी पर प्राय: एक झुगी झोंपडी बस्ती होती…
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निशा, क्या बात है, आरती अपना स्कूटर रोक कर क्या कह रही थी ? अरे यार कुछ नहीं…
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