सीमा स्मृति — रचनाएँ
संग्रह की रचनाएँ

अनिश्चित
क्षणिकाकैसे बनेगें हम किसी के जीने का मकसद दोस्त निश्चित है मकसद की डोर तेरी मेरी सोच से…
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वक्त
क्षणिकाकभी ख़ामोशी लगती है जुबां प्यार की कौन जाने, कब बन जाये सज़ा प्यार की । सीमा स्मृति
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प्रतिबिम्ब
क्षणिकावो आया था मेरी जिन्दगी की सिलवटें पढ़ने देख आईना नि:शब्द लौट गया। सीमा स्मृति
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