प्रश्न
क्षणिकाजो ‘अर्थ’ जिन्दगी को हम देना चाहते हैं अर्थ स्वंय जो पाती है जिन्दगी इसी कशमकश में अक्सर…
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जो ‘अर्थ’ जिन्दगी को हम देना चाहते हैं अर्थ स्वंय जो पाती है जिन्दगी इसी कशमकश में अक्सर…
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तेरे कहने से, मैंनें दिया इक रूप अपने एहसासों को बांध कर तेरी याद मुट्ठी में उड़ा रही…
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ऐस्सी कार के रंगीन शीशों से झांकती दो आंखे, फेर लेती हैं मुहँ चिलचिलाती धूप में, देख अर्धनग्न…
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ओस की बूंद-सा अस्तित्व सूर्य किरण में सिमटता चन्द्र किरण से खिलता ये अस्तित्व के धरातल पर ओस-सा…
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परिस्थितियों की कठपुतली आवाज देती है जब कभी निज अस्तित्व की केवल प्रतिघ्वनित होकर रह जाती है वो…
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कब तलग जोड़ते, सहेजते रहोगे वो पैबंद, जो लगाये थे तुमनें मेरी जिन्दगी में प्यार के नाम पर…
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जिन्दगी की किताब के पृष्ठ बदलते रहे उन पर अंकित गहरी काली रेखाएँ कुछ अमिट तनिक सिमट कहती…
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जिन्दगी करती है सवाल मुझसे क्या है गम और है क्या खुशी ? अतल सागर में तलाशता है…
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