तुझसे मिलना इक रवायत नहीं किसी उम्र का महकता सुरूर भी नहीं बदली हवाओं में थमा सा कोई नशा भी नहीं । तुझ से मिलना जिन्दगी में मिले छालों को, अपने ही हाथों से मरहम लगाना -सा दर्पण में अक्स की पहचान सा रात के बाद दिन से मुलाकात -सा यथार्थ के टुकडों को सँजोना -सा अतीत में थमे एहसास सा लगता है मुझे । सीमा स्मृति

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