♪रचना सुनेंऑडियो उपलब्ध नहीं है हाइकु8 जनवरी 2014सीमा स्मृति कांपी धरती कांपी धरतीपिघला आसमानमूक इंसान। टूटा घरौंदाबिखरा है सामानकैसी पहचान। रौंदी धरतीभूले हैं परिणामअब हैरान। वीरान बस्तीसहमी है धरतीये है प्रगति। गीत भूलमीलों तक खमोशीसुनाती दास्ताँ।