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शीर्षक रहित रचना
- तलाशती रही ज़िन्दगी-साथउनके भी साथ ,जो चलते रहे साथ साथ।
- ख़ामोशी को अक्सरराह का पत्थर समझठोकरे मिलती हैंचशनी में डूबे शब्दजो छलनी भी करेंदर्द रोमान्स लगता है।बात स्व:प्रकृति की हैकिसको क्या अच्छा लगता है|
- बाँसुरी सी तेरी यादआज भी मन की तहो मेंदेती सुर सुबह नये गीत सी और शाम गज़ल सी बन जाती ।
- कुदरत लिखती रहीहर दिनजिन्दगी की किताब के पन्नेंहम किताबों में खोजते रहे ज़िन्दगी।
- सागर से पूछाकैसे हज़ारो राजअपने तहों में छिपाये रहते होसागर मुस्कराया और बोलामैं इंसान नहींजो अनभिज्ञ रहेअपने ही मन की थाह से।
- ये जिन्दगीठीक उसी सहेली सी हैजो प्यार तो बहुत करती हैपर मन की किसी तह मेंजलन सम्भाले रखती है।
सीमा स्मृति