उडेल सको अपनी थकान,मुस्कान चिढ़ और गुस्सा चिल्लाया जा सके झल्लाया जा सके शब्द बोझ न हो जहाँ सोच पर बंधन न हो दर्द को दर्द की ही तरह बाँटा जा सके खुशी को जिया जा सके प्रश्नों के तीर न हों डर न हो रिश्ते की टूटन का भय न हो खो देने का छूट हो कुछ भी कहने की- मन में जो भी धमक दे जहाँ लम्हें शर्तो पर न जिए जाएँ माँगे हो, न पूरी होने पर, अनजाना डर न हो आदर सम्मान केवल शब्दों की चाशनी में लिपटे न हों, रिश्ता बन सके ,आईना जिन्दगी का पाना चाहता है हर शख़्स यह खूबसूरत रिश्ता दे पाना, यह खूबसूरती आज भी है, प्रश्नों की सलीब पर । सहज साहित्य पर प्रकाशित मेरी कविता

रचना सुनें
ऑडियो उपलब्ध नहीं है