भटकन की रेत पे जलते हैं पाँव कितनी भी तलाशो मिलती नहीं छाँंव । बिना पानी का ये दलदल छीन लेता है चैन हर पल । जिन्दगी भूल जाती है गाना, गुनगुनाना मुस्कराना अपनी ही ताल पे थिरन जाना किस्मत की दुहाई से बढ़ी भटकन कर्म की मशाल से छटी है भटकन। सीमा स्मृति

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