♪रचना सुनेंऑडियो उपलब्ध नहीं है क्षणिका7 नवम्बर 2013सीमा स्मृति ‘मूक’ स्पर्श केवल, अंघकार की जबान नहीं, यह भाषा है, प्रत्येक जीवन की भट्टी के अंगारो की तरह उकेरा है हर स्पर्श से पूर्व ‘जिन्दगी’ ने ।