साल: 2014
82 रचनाएँ
2014
दिसम्बर
क्षणिका
प्रतिबिम्ब
वो आया था मेरी जिन्दगी की सिलवटें पढ़ने देख आईना नि:शब्द लौट गया। सीमा स्मृति
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कविता
पहचान
देख ये है हैवानियत कुदरत भी है हैरान क्या मैंने ही बनाया था इंसान अपनी ही नस्लों को…
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क्षणिका
मुलाकात
तुझसे मिलना इक रवायत नहीं किसी उम्र का महकता सुरूर भी नहीं बदली हवाओं में थमा सा कोई…
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क्षणिका
कोहरा
क्यों पनपने लगती है वो बेल, हमारे भीतर ले कोहरे की छुहन । काटते रहे हर बार टुकड़ा…
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