साल: 2014
82 रचनाएँ
2014
दिसम्बर
क्षणिका
अनिश्चित
कैसे बनेगें हम किसी के जीने का मकसद दोस्त निश्चित है मकसद की डोर तेरी मेरी सोच से…
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क्षणिका
वक्त
कभी ख़ामोशी लगती है जुबां प्यार की कौन जाने, कब बन जाये सज़ा प्यार की । सीमा स्मृति
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